योगेंद्रशुक्ल का जन्म बिहार के जलालपुर गांव के एक मामूली किसान परिवार में 30 अक्तूबर , 1896 को हुआ था । जन्म के कुछ ही साल बाद उनकी मां की हैजे से मृत्यु हो गई थी । पढ़ने - लिखने में अच्छे होने के कारण परिजनों ने इन्हें मुजफ्फरपुर में पढ़ाई करने के लिए भेज दिया था । उसी दौरान 1908 में खुदीराम बोस को फांसी हुई थी , जिसने पूरे देश को हिला दिया था । उस फांसी ने युवा योगेंद्र पर भी असर डाला और वह आजादी की लड़ाई में कूद पड़े । असहयोग आंदोलन में हिस्सा लेने के कारण योगेंद्र शुक्ल को जेल जाना पड़ा । जेल से छूटने के बाद वह गांधी जी के साबरमती आश्रम में चले गए , जहां वह हर तरह के काम करते थे . लेकिन प्रार्थना सभा में शामिल नहीं होते थे , क्योंकि उन्हें ईश्वर और प्रार्थना में विश्वास नहीं था । लेकिन हर आश्रमवासी का प्रार्थना सभा में शामिल होना अनिवार्य था । गांधी जी से इसकी शिकायत की गई , तो उन्होंने कहा कि ' प्रार्थना से जो चीज मनुष्य को प्राप्त होती है , वह योगेंद्र को यों ही प्राप्त है । अहिंसा में यकीन न होने के कारण योगेंद्र शुक्ल क्रांतिकारियों के दल में शामिल हुए । वह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य और भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त के सहयोगी थे । भगत सिंह को लाहौर जेल से छुड़ाने की योजना बनी तो चंद्रशेखर आजाद ने योगेंद्र शुक्ल को इस काम के लिए बिहार से बुलवाया । पर भेद खुल जाने से योजना टाल दी गई । योगेंद्र शुक्ल दिल्ली से ट्रेन से चले , तो सीआईडी के लोग उनके पीछे लग गए । उन्हें इसका आभास हुआ , तो चलती ट्रेन से कूद गए । क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए उन्हें कालापानी की सजा मिली । उसी दौरान 1934 में बिहार में आए भूकंप पर जब गांधी जी हाजीपुर और लालगंज गए थे , तब उन्होंने योगेंद्र शुक्ल से मिलने की इच्छा जताते हुए उनके घर का पता पूछा था । उसी साल उनके भतीजे बैकुंठ शुक्ल को अंग्रेजों ने फांसी की सजा दी थी । जेल में भूख हड़ताल करने के कारण योगेंद्र शुक्ल को हजारीबाग सेंट्रल जेल में भेज दिया गया , पर राज्य में पहली कांग्रेस सरकार बनने पर उनकी रिहाई हुई । वह कांग्रेस से जुड़े , पर जयप्रकाश नारायण के अनुरोध पर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए । लेकिन 1940 में अखिल भारतीय किसान सभा की केंद्रीय कमेटी में सहजानंद सरस्वती की जगह सदस्य बनते ही वह गिरफ्तार कर लिए गए । भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जयप्रकाश नारायण और दूसरे कुछ क्रांतिकारियों के साथ योगेंद्र शुक्ल हजारीबाग जेल की दीवार फांदकर फरार हो गए थे । वे भूमिगत होकर बापू के आंदोलन के लिए काम करना चाहते थे । कहते हैं कि जयप्रकाश नारायण के बीमार होने के कारण योगेंद्र शुक्ल करीब सवा सौ किलोमीटर तक उन्हें अपने कंधे पर उठाकर ले गए थे । पर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें मुजफ्फरपुर से गिरफ्तार कर बक्सर जेल भेज दिया और अप्रैल , 1946 में उन्हें रिहा किया गया । क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण उन्हें करीब साढ़े सोलह साल तक जेल की सजा काटनी पड़ी थी । उस दौरान उन्हें भीषण यातनाएं दी गई थीं , जिससे वह अस्वस्थ हो गए और उनकी एक आंख की रोशनी भी चली गई । वर्ष 1958 में वह बिहार विधान परिषद के सदस्य बनाए गए , पर बीमारी में ही वर्ष 1960 में उनकी मृत्यु हो गई । उनकी स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया गया है ।
बुधवार, 3 अगस्त 2022
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