हिटलर द्वारा पार्टियों की परख :
जब वह राष्ट्रहितों के लिये सत्ता का प्रयोग करे अथवा ऐसा न करने का संकल्प ले जिससे राष्ट्र हितों को कोई नुकसान पहुंचता हो । राज्य अपने आप में अन्तिम सच नहीं होती है । यदि ऐसा मान लिया जाता तो हर प्रकार के अत्याचार और अन्याय भाग्य की परिधि में आ जाते , जो कि एक असत्य बात है ; यदि उपलब्ध शक्ति के साधनों का प्रयोग कोई लिये करती है तो प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य भी सरकार जनता के विनाश बनता है कि वह उसका विरोध करे । यह भी एक कटु सत्य है कि कोई सरकार भले ही कितनी आलसी और निकम्मी हो तथा उसने राष्ट्र के साथ भले ही हजारों बार विश्वासघात ही क्यों न किया हो किन्तु वह यही दावा करती है कि वह राज्य की सत्ता को बनाये रखने को अपना धर्म मानती है । ऐसे शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय गौरव हेतु लड़ रहे विरोधियों को अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिये उन्हीं साधनों को प्रयोग में लाना चाहिये , जिन्हें सबसे पहले सरकार प्रयोग करती आ रही थी राज्य अधिकारों से भी अधिक महत्वपूर्ण उसका मानव अधिकार का है । अगर मानव अधिकार के लिये चलाये गये अभियान में जनता की शिरकत होती तो उसका साफ - सा मतलब यह है कि उसका दुनिया में रहना ही बेकार है । उन जातियों को अपने अस्तित्व को बनाये रखना कठिन है , जिनका मनोबल टूट गया हो । इसका सजीव , स्पष्ट तथा आश्चर्यजनक उदाहरण आस्ट्रिया है कि किस तरह से अत्याचार खुद को कानूनी पर्दे में छिपाकर स्वयं को बचाने में सफल हो जाता है । कानून क्या है ? और कानून को बनाता कौन है ? कानून मानव द्वारा बनाया गया एक संविधान है , जिसके तहत वह अपने देश का राष्ट्र का निर्माण करता है । जब कोई कानून लागू हो जाता है तो मनुष्यों का कर्त्तव्य बन जाता है कि वह उसका पालन करें । इसी सारी बकवास को बेबुनियाद साबित कर देना पैन जर्मन आंदोलन की सबसे बड़ी देन थी । हालांकि इससे धर्माचार्यों व सिद्धान्तवादियों को करारा झटका लगा । पैन जर्मन पार्टी ने हैब्जबर्ग के विरुद्ध खासा मोर्चा तब लिया जब वह उपलब्ध साधनों का प्रयोग करते हुए आक्रामक ढंग से जर्मन जाति के निकट आने का प्रयास कर रहा था । राज्य में फैले भ्रष्टाचार को खोलकर उसका रहस्योद्घाटन करने वाली यह पहली पार्टी थी । उसके कार्यों ने सभी की आंखा पर्दे हटा दिये थे । पैन जर्मन आन्दोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यही थी कि इसने दलित वर्ग को न केवल गले से लगाया , बल्कि उसने देश - भक्ति जैसे उच्च आदर्श की भावना का भी समावेश किया यह दल जब पहली बार उभर कर आया तो उसके बहुत सारे समर्थक हो गये आरम्भ में इस आंदोलन के देश भर में फैल जाने की पूरी आशंका थी । किन्तु दुर्भाग्य से उसकी प्रारम्भिक सफलताओं को संभाला नहीं जा सका । आंदोलन के वियाना प्रवास के आरम्भिक दौर में ही क्रिश्चियन सोशलिस्ट पार्टी इस आंदोलन को थी । पैन जर्मन पार्टी का विस्तार नहीं हो सका । इसके उत्थान व पतन के साथ - साथ क्रिश्चियन सोशलिस्ट पार्टी की चकित कर देने वाली प्रगति - ये सभी अडोल्फ हिटलर के अध्ययन की प्रिय सामग्रियां थीं । आगे चलकर ये विषय उसके विचारों के विकास में अत्यधिक मददगार साबित हुए । अडोल्फ जब वियाना में आया तो उसकी पूरी हमदर्दी पैन जर्मन आंदोलन के साथ थी । वह इस बात से बहुत प्रभावित हुआ था कि उनमें " हैल हो अनजोर्लन " का नारा लगाने का साहस व जज्बा था । साथ ही वे खुद को जर्मन साम्राज्य का अखण्डित हिस्सा मानते थे । उनके इस फैसले से हिटलर को बहुत खुशी मिली , जबकि अस्थायी रूप से वे उससे अलग हो गये थे । यह बात हिटलर को बड़ी अजीत लगी कि यह संघर्ष इतनी जल्दी कैसे समाप्त हो गया ? जबकि इसका आरम्भ योजनाबद्ध तरीके से हुआ था । इसके अलावा एक बात और हिटलर को हैरान कर रही थी कि आखिर इतने थोड़े समय में क्रिश्चियन सोशलिस्ट पार्टी इतनी शक्तिशाली कैसे हो गयी ? उसने लोकप्रियता के चरमोत्कर्ष को छू लिया था । हिटलर ने जब इन दोनों आंदोलनों की तुलना की , तो ईश्वर ने इस उलझी हुई गुत्थी के कारणों को स्पष्ट करने के उसको उत्तम साधन प्रदान किये । उसके जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी उसके भाग्य ने उसका बहुत साथ दिया । हिटलर ने अपने अध्ययन का विश्लेषण करते समय पाया कि इन दोनों आंदोलनों के संस्थापक - संचालक कहे जाने वाले दो महान आदमी थे । इनमें से एक का नाम शोजरर तथा दूसरे का नाम कार्ल लिउजर था । हिटलर ने जब इन दोनों महापुरुषों की निजी योग्यताओं का विश्लेषण किया तो उसने पाया कि लिउजर से ज्यादा शोजरर मूल समस्याओं के प्रति अति गम्भीर तथा उपयुक्त चिंतक थे । शोजरर को समस्याओं की वास्तविक गहराइयों में उतरने में तो सफलता मिल गयी , मगर वह लोगों को समझने और उन्हें समझाने में मात खा गये । शोजरर का यही दोष लिउजर का गुण था । उसमें मानव स्वभाव को परखने की अद्भुत क्षमता तो थी ही , साथ ही वह इस विषय के प्रति भी काफी सजग थे । कि किस आदमी को कितना महत्व दिया जाये । उनकी योजनाएं मानवीय व्यावहारिक संभावनाओं पर आधारित थीं । इसके विपरीत , शोजरर इस क्षेत्र काफी पिछड़े हुए थे ।
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